हाल के दिनों में भारतीय विज्ञापन जगत में एक नई बहस छिड़ गई है। ज्वैलरी ब्रांड गिवा ने अपना रक्षाबंधन विज्ञापन अभिनेत्री कृति सेनन की अदाकारी के साथ जारी किया, लेकिन सोशल मीडिया पर कुछ उपयोगकर्ताओं की ओर से आपत्ति जताए जाने के बाद कंपनी ने इसे वापस ले लिया। इस घटनाक्रम ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या ब्रांड्स सोशल मीडिया पर उठने वाले गुस्से पर अत्यधिक संवेदनशील होकर तुरंत अपने निर्णय बदल रहे हैं, भले ही वह गुस्सा बहुत कम संख्या के लोगों द्वारा या कुछ हद तक निर्मित किया गया हो।
दरअसल, यह पहली बार नहीं है जब किसी ब्रांड ने ऐसी स्थिति में अपना विज्ञापन या अभियान वापस लिया है। पिछले कुछ वर्षों में कई ब्रांड्स ऐसे उदाहरण सामने आए हैं, जिनमें विज्ञापन जारी होने के तुरंत बाद सोशल मीडिया पर किसी न किसी आधार पर विरोध शुरू हुआ और कंपनियों ने बिना देरी किए अपने कदम पीछे खींच लिए। विश्लेषकों का कहना है कि आज के डिजिटल दौर में ब्रांड्स के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे किसी भी संभावित विवाद से बचने के लिए कितनी दूरी बनाए रखें।
सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म्स पर अभियान चलाने वाले समूह अक्सर एक ही संदेश को कई खातों से प्रसारित करते हैं, जिससे यह भ्रम उत्पन्न होता है कि विरोध जनता का व्यापक हिस्सा कर रहा है। विपणन विशेषज्ञों के अनुसार, कभी-कभी कुछ लोग जानबूझकर या व्यक्तिगत एजेंडे के तहत ऐसे अभियान चलाते हैं, ताकि ब्रांड को अपने विज्ञापन या उत्पाद से दूरी बनाने के लिए मजबूर किया जा सके। इसे अंग्रेज़ी में अक्सर 'मैन्युफैक्चर्ड आउट्रेज' यानी निर्मित गुस्सा कहा जाता है।
इस मुद्दे पर 'द हिंदू' के 'इन फोकस' पॉडकास्ट में प्रकाशित एक विस्तारित चर्चा में मेजबान सोनिक्का लोगनाथन ने विपणन क्षेत्र की जानकार मीतुशी शर्मा और विज्ञापन जगत के अनुभवी विश्लेषक संतोष देसाई से बातचीत की। चर्चा का केंद्रीय बिंदु यही था कि क्या ब्रांड्स वास्तविक जनभावना और निर्मित गुस्से के बीच का अंतर समझ पा रहे हैं, और क्या वे सही प्रतिक्रिया दे रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि ब्रांड्स के पास अब बहुत सीमित समय होता है। सोशल मीडिया पर एक पोस्ट कुछ ही घंटों में वायरल हो जाती है। ऐसे में कंपनियों की आपदा प्रबंधन टीमें सतर्क रहती हैं और किसी भी तरह की प्रतिकूल प्रतिक्रिया को रोकने के लिए तत्काल कदम उठाती हैं। लेकिन सवाल यह है कि जब विरोध कुछ ही लोगों द्वारा किया जा रहा हो या वह किसी विशेष एजेंडे से प्रेरित हो, तो क्या ब्रांड को इतनी जल्दी अपना निर्णय बदलना चाहिए?
दूसरी ओर यह भी तर्क दिया जाता है कि आज के उपभोक्ता अधिक जागरूक हैं और वे ब्रांड्स से सामाजिक मुद्दों पर स्पष्ट और संवेदनशील रुख की उम्मीद करते हैं। ऐसे में अगर किसी विज्ञापन में किसी समुदाय, लिंग या सामाजिक वर्ग की भावनाओं को ठेस पहुंचती दिखती है, तो ब्रांड के लिए चुप रहना भी एक बड़ा जोखिम बन सकता है। यही कारण है कि कई कंपनियां पहले से ही अपने विज्ञापनों की जांच-पड़ताल अधिक सतर्कता से करती हैं और विवाद की आशंका होने पर उन्हें जारी करने से पहले ही रोक देती हैं।
विज्ञापन उद्योग से जुड़े लोग यह भी रेखांकित करते हैं कि ब्रांड की छवि और उपभोक्ता का भरोसा किसी भी कंपननी की सबसे बड़ी पूंजी होती है। एक विवादित विज्ञापन के कारण ब्रांड की साख को लंबे समय तक नुकसान पहुंच सकता है। इसलिए ब्रांड्स अक्सर सुरक्षित रास्ता चुनते हैं और संभावित विवाद से दूर रहने की कोशिश करते हैं। हालांकि, इस प्रवृत्ति की आलोचना भी होती है। आलोचकों का कहना है कि बार-बार झुकने से ब्रांड्स का रचनात्मक स्वतंत्रता सीमित होती जा रही है और विज्ञापन जगत की विविधता प्रभावित हो रही है।
एक अन्य पहलू यह भी है कि सोशल मीडिया पर किसी भी विषय पर प्रतिक्रिया जुटाना अब पहले से कहीं अधिक आसान हो गया है। कुछ लोग या समूह इसका इस्तेमाल ब्रांड्स पर दबाव बनाने के लिए भी करते हैं। ऐसे मामलों में ब्रांड को यह तय करना मुश्किल हो जाता है कि विरोध वास्तविक है या निर्देशित अभियान का हिस्सा है। पॉडकास्ट में भी इस बात पर ज़ोर दिया गया कि ब्रांड्स को ऐसी स्थितियों में संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की ज़रूरत है।
गिवा का हालिया विज्ञापन और उसके बाद की प्रतिक्रिया इस बात का ताज़ा उदाहरण है कि भारतीय ब्रांड्स भी वैश्विक स्तर पर इसी तरह की चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। कृति सेनन फ़िल्म जगत की जानी-मानी अभिनेत्री हैं और उनकी लोकप्रियता युवा वर्ग में काफ़ी अधिक है। ऐसे में जब उनके साथ जारी किया गया रक्षाबंधन विज्ञापन वापस लिया गया, तो इस चर्चा ने और अधिक तूल पकड़ लिया।
पॉडकास्ट में विशेषज्ञों ने यह भी कहा कि ब्रांड्स को केवल ऑनलाइन प्रतिक्रिया देखकर ही निर्णय नहीं लेना चाहिए, बल्कि अपने व्यापक उपभोक्ता आधार की राय को भी समझना चाहिए। कई बार ऐसा होता है कि सोशल मीडिया पर दिखने वाला विरोध असली जनभावना का प्रतिनिधित्व नहीं करता। ऐसे में ब्रांड को अपने संचार रणनीतिकारों, विपणन टीम और सामाजिक विशेषज्ञों की राय लेकर संतुलित निर्णय लेना उचित होता है।
भारतीय विज्ञापन उद्योग लगातार विकसित हो रहा है। डिजिटल मीडिया के विस्तार, उपभोक्ता जागरूकता में वृद्धि और सोशल मीडिया की ताक़त ने ब्रांड्स के सामने नई चुनौतियां खड़ी की हैं। अब ब्रांड्स को केवल उत्पाद बेचने की कला ही नहीं आनी चाहिए, बल्कि सामाजिक संवेदनशीलता, सांस्कृतिक विविधता और जनभावनाओं को भी समझना होगा। यही कारण है कि विपणन रणनीति अब पहले से कहीं अधिक जटिल और सतर्कता-भरी हो गई है।
अंत में, गिवा का उदाहरण और इस पर 'द हिंदू' के पॉडकास्ट में हुई चर्चा इस बात की ओर इशारा करती है कि भारतीय ब्रांड्स के लिए यह तय करना आसान नहीं है कि वे कब पीछे हटें और कब अपने रचनात्मक निर्णय पर अडिग रहें। आने वाले समय में यह विषय और अधिक प्रासंगिक होता जाएगा, क्योंकि डिजिटल मीडिया का दायरा और प्रभाव दोनों ही बढ़ते रहेंगे।



