कृष्णा सोबती, जिनकी लेखनी ने कई पाठकों के दिलों में जगह बनाई, आज भी याद की जाती हैं। उनकी रचनाएँ, जो अक्सर प्रतीक्षा में रहती थीं, कभी भी प्रकाशित नहीं हो पाईं।
उनका लेखन के प्रति अनुशासन इतना सख्त था कि वे अपनी किसी भी रचना को पाठकों तक पहुँचाने से पहले पूरी तरह संतुष्ट होने की शर्त रखती थीं। इस कारण, कई बार उनकी लेखनी अनकही रह गई।
कृष्णा सोबती की लेखनी में गहरी भावनाएँ और सूक्ष्म अवलोकन थे। वे अपने अनुभवों को शब्दों में बुनती थीं, परंतु अपनी रचनाओं को प्रकाशित करने में सतर्क रहती थीं।
उनकी लेखनी के प्रति यह सख्त रवैया, उनके अनुशासन का प्रतीक था। यह भी कहा जाता है कि वे अपनी रचनाओं को तब तक प्रकाशित नहीं करती थीं जब तक कि वे पूरी तरह से संतुष्ट नहीं हो जाती थीं।
कृष्णा सोबती की लेखनी का इंतजार हमेशा रहता था। उनके पाठक, उनकी रचनाओं के आने का बेसब्री से इंतजार करते थे। परंतु, उनकी सख्त अनुशासन के कारण, उनकी रचनाएँ कभी भी प्रकाशित नहीं हो पाईं।
उनकी लेखनी में गहरी भावनाएँ और सूक्ष्म अवलोकन थे। वे अपने अनुभवों को शब्दों में बुनती थीं, परंतु अपनी रचनाओं को प्रकाशित करने में सतर्क रहती थीं।
कृष्णा सोबती की लेखनी के प्रति यह सख्त रवैया, उनके अनुशासन का प्रतीक था। यह भी कहा जाता है कि वे अपनी रचनाओं को तब तक प्रकाशित नहीं करती थीं जब तक कि वे पूरी तरह से संतुष्ट नहीं हो जाती थीं।
उनकी लेखनी का इंतजार हमेशा रहता था। उनके पाठक, उनकी रचनाओं के आने का बेसब्री से इंतजार करते थे। परंतु, उनकी सख्त अनुशासन के कारण, उनकी रचनाएँ कभी भी प्रकाशित नहीं हो पाईं।



