हिंदी दिवस के मौके पर हम उन पुरोधाओं को याद कर रहे हैं जो गैर हिंदीभाषी होने के बावजूद हिंदी को भाषा ही नहीं बल्कि देश को जोड़ने की कड़ी मानते थे।
इस वर्ष के कार्यक्रम में प्रमुख रूप से महात्मा गांधी को हिंदी के सबसे बड़े पैरोकार के रूप में सम्मानित किया गया। गांधीजी ने अपनी लेखनी और भाषणों में हिंदी के महत्व पर बल दिया, यह दर्शाते हुए कि भाषा राष्ट्रीय एकता का आधार है।
सभी कार्यक्रमों में यह स्पष्ट किया गया कि गांधीजी ने हिंदी को केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक माना। उन्होंने कहा कि भाषा के बिना समाज का विकास संभव नहीं।
इस संदर्भ में, कई शिक्षकों और साहित्यकारों ने गांधीजी के विचारों पर प्रकाश डाला, यह बताते हुए कि उन्होंने अपने समय में ही हिंदी को राष्ट्रीय भाषा के रूप में बढ़ावा देने का प्रयास किया।
हिंदी दिवस के कार्यक्रमों में एक पैनल चर्चा भी आयोजित की गई, जिसमें विद्वानों ने गांधीजी के भाषणों और लेखों का विश्लेषण किया। उन्होंने यह भी बताया कि गांधीजी ने हिंदी को सभी वर्गों के बीच संवाद का माध्यम बनाया।
इसके अलावा, कार्यक्रम के दौरान एक विशेष प्रदर्शनी भी आयोजित की गई, जिसमें गांधीजी के समय की हिंदी साहित्य की प्रतियाँ और पांडुलिपियाँ प्रदर्शित की गईं।
सभी कार्यक्रमों का समापन एक सांस्कृतिक कार्यक्रम से हुआ, जिसमें पारंपरिक नृत्य और गीतों के माध्यम से हिंदी की समृद्धि को दर्शाया गया।
इस प्रकार, हिंदी दिवस 2018 पर महात्मा गांधी को हिंदी के सबसे बड़े पैरोकार के रूप में याद किया गया, और यह स्पष्ट हुआ कि भाषा के प्रति उनका समर्पण आज भी प्रासंगिक है।



